शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

श्रावण मास श्रावण मास कि संक्राँति का महत्व |हिमाचल में चिड़नु कि संग्राँद


श्रावण मास श्रावण मास कि संक्राँति का महत्व |हिमाचल में चिड़नु कि संग्राँद




श्रावण मास का महत्व

दोस्तों श्रावण मास सूर्य के कर्क राशी में प्रवेश करने पर शुरू होता है |     श्रावण मास में चतुर्मास का प्रारंभ भी होता है |इस माह भगवान सूर्य उतरायण से दक्षिणायन कि तरफ सफर करते हैं | इस माह में भगवान शिव तथा पार्वती जी कि उपासना का विशेष महत्व है |

श्रावण मास का भगवान श्रीविष्णु जी से संबंध

मान्यता है कि इस समय से अगले चार मास तक श्रिष्टि के पालनहार श्री भगवान विष्णु जी विश्राम पर चले जाते हैं तथा उन के पीछे यह काम भगवान शिव तथा पार्वती जी संभालते हैं |

श्रावण मास का भगवान शिवजी से संबंध

एक अन्य मान्यता के अनुसार पार्वती जी  का जन्म पिता हिमवान व माता मैना के यहाँ हुआ तो ,हर जन्म में शिव भगवान को पति रूप में पाने कि अपनी सौगंध के कारणवश उन्होंने शिव कि कठोर उपासना कि तथा शिव का पति रूप में वरण किया 

माना जाता है कि सावन या श्रावण मास में शिव भगवान हर वर्ष धरती पर अवतरित होकर अपने ससुराल आते हैं | 

अत: ऊपर बताए कारणों के कारण इस महीने का भगवान शिव तथा पार्वती जी से खासा संबंध है |सावन मास के पहले सोमवार से इस महीने के व्रत व त्योहार शुरू होते हैं ,अत: जो भी भक्त सावन मास में भगवान शिव तथा पार्वती जी कि उपासना करता है उसे मनवाँछित फल कि प्राप्ति होती है |इस माह में पवित्र नदियों के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक खासकर फलदायक है |

हिमाचल में श्रावण माह के पहले दिन मनाए जाने वाले त्योहार 

श्रावण मास कि संक्राँति में हिमाचल के मंडी,हमीरपुर,काँगड़ा और बिलासपुर आदि इलाकों में "चिड़नु या चिड़न" का त्यौहार ,लाहौल में "शेगत्सुम" तथा जुब्बल तथा किन्नौर में "दखरैण" का त्यौहार मनाया जाता है |इस दिन पशुओं के स्वास्थय के लिए कामना कि जाती है |



श्रावण मास में कीड़ों कि अधिकता हो जाती है जिस में सुक्ष्म से लेकर बड़े जीव सब शामिल हैं |अत: पशु चारे के साथ-साथ कई तरह के जीव भी खा जाते हैं |पशुओं के स्वास्थय कि कामना करते हुए हिमाचल में श्रावण माह कि संक्राँति को  बिशेष पूजा होती है | इस दिन पशुओं के शरीर में पाए जाने वाले परजीवी (जिन्हें हिमाचली में चिड़नु या चिड़न ,हिन्दी  में किलनी तथा अंग्रेजी में Tick कहते हैं) कीड़ों को इक्टठा कर के गोबर में डालकर उन्हें चौराहे में जलाया जाता है |



Significance of Sankranti of Shravan month Shravan month | Sangrand of Chidnu in Himachal 


Significance of Shravan Month 

Friends, the month of Shravan begins when the Sun enters the Cancer Rashi. Chaturmasa also begins in the month of Shravan. In this month Lord Surya travels from Uttarayana to Dakshinayana. Worship of Lord Shiva and Parvati has special significance in this month. 

Relationship of Shravan month with Lord Shri Vishnu

It is believed that from this time for the next four months, Lord Vishnu ji, the caretaker of Shrishti, goes on rest and behind him this work is handled by Lord Shiva and Parvati.

 Relationship of Shravan month with Lord Shiva 

According to another belief, Parvati ji was born to father Himwan and mother Maina, so because of her promise to have Lord Shiva as her husband in every birth, she worshiped Shiva harshly and got Shiva as her husband.

It is believed that in the month of Sawan or Shravan, Lord Shiva descends on the earth every year and comes to his in-laws' house.

 Therefore, due to the reasons mentioned above, this month has a lot of relation with Lord Shiva and Parvati. The fasts and festivals of this month start from the first Monday of the month of Sawan, so any devotee who worships Lord Shiva and Parvati in the month of Sawan get the desired results. In this month, Lord Shiva's Jalabhishek with the water of holy rivers is especially fruitful.

 Festivals celebrated on the first day of Shravan month in Himachal

The festival of "Chidnu or Chidan" is celebrated in areas like Mandi, Hamirpur, Kangra and Bilaspur , "Shegatsum" in Lahaul and "Dakhrain" in Jubbal and Kinnaur. 

 In the month of Shravan, there is an abundance of insects, which includes small to large creatures. Therefore, along with animal feed, many types of creatures are also eaten. Wishing the health of the animals, the Sankranti of the month of Shravan in Himachal has special worship.On this day, the parasites found in the body of animals (which are called Chidnu or Chidan in Himachali, Kilni in Hindi and Tick in English) are collected and put in cow dung and burnt in the crossroads.

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